लो फिर छिड गयी बहस ,
औरतों के शोषण की |
पर मौलिक बात को किया ,
हर किसी ने नजर अंदाज़ |
ये मर्दों ने औरत का शोषण नहीं किया ,
शोषण किया है ताकतवर ने कमजोरों का |
कंही भी देख लो ,पलट लो पन्ने इतिहास के |
शोषक चाहे जमींदार हो ,जागीरदार हों ,सवर्ण हों,
अंग्रेज हों , मिल मालिक हों ,नेता हों ,
सरकार हो, मर्द हो या हों इन्सान |
शोषित चाहे रियाया हो , दलित हों , गुलाम भारतीय हों,
मजदूर हों,मतदाता हों, जनता हों , औरत हों या हो प्रकृति |
सत्ता, प्रभुता, श्रेष्ठता , हनक
बनाये रखने की जद्दो- जहद में
मानवता शर्म सार है |
एक प्रश्न -
अगर पृथ्वी (प्रकृति) शोषित है ,
तो शोषक कौन है ?
ये नेता ,ये सरकारें ,
या उपभोग की मानसिकता ,
तब न हम मर्द हैं न औरत हैं ,
न हिन्दू हैं न मुस्लिम हैं,
न मालिक हैं न मजदूर ,
हैं तो केवल उपभोक्ता
इस दुनिया में ,
शोषक भी हैं और शोषित भी |
यक्ष प्रश्न फिर सर उठाता है ,
शोषित को गर हस्तानांतरित हो सत्ता ,
तो क्या वो शोषक न बन जायेगा ????
Monday, July 1, 2013
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"ज़िसकी लाठी उसकी भैंस" वाली कहावत शायद इसी मानसिकता की टैग लाइन है "जियो और जीने दो " क्या फ्रेम में सजाने के लिये ही गढ़े गये थे?
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