लो फिर छिड गयी बहस ,
औरतों के शोषण की |
पर मौलिक बात को किया ,
हर किसी ने नजर अंदाज़ |
ये मर्दों ने औरत का शोषण नहीं किया ,
शोषण किया है ताकतवर ने कमजोरों का |
कंही भी देख लो ,पलट लो पन्ने इतिहास के |
शोषक चाहे जमींदार हो ,जागीरदार हों ,सवर्ण हों,
अंग्रेज हों , मिल मालिक हों ,नेता हों ,
सरकार हो, मर्द हो या हों इन्सान |
शोषित चाहे रियाया हो , दलित हों , गुलाम भारतीय हों,
मजदूर हों,मतदाता हों, जनता हों , औरत हों या हो प्रकृति |
सत्ता, प्रभुता, श्रेष्ठता , हनक
बनाये रखने की जद्दो- जहद में
मानवता शर्म सार है |
एक प्रश्न -
अगर पृथ्वी (प्रकृति) शोषित है ,
तो शोषक कौन है ?
ये नेता ,ये सरकारें ,
या उपभोग की मानसिकता ,
तब न हम मर्द हैं न औरत हैं ,
न हिन्दू हैं न मुस्लिम हैं,
न मालिक हैं न मजदूर ,
हैं तो केवल उपभोक्ता
इस दुनिया में ,
शोषक भी हैं और शोषित भी |
यक्ष प्रश्न फिर सर उठाता है ,
शोषित को गर हस्तानांतरित हो सत्ता ,
तो क्या वो शोषक न बन जायेगा ????
Monday, July 1, 2013
Saturday, February 7, 2009
हिन्दी मेरी पहचान नाम से ब्लॉग शुरु करने का उद्देश्य
हिन्दी मेरी पहचान नाम से ब्लॉग शुरु करने का उद्देश्य :
क्यो एक प्रतिभा शाली को अपनी प्रतिभा को प्रर्दशित करने के लिए एक विदेशी भाषा का मोहताज होना पड़ता है ?
क्न्यो एक ऐसी भाषा में उसे स्तरीअ सामग्री उपलब्ध है , जो उसे कम समझ में आती है ?
और उस भाषा में उपलब्ध नही है जिसमे उसे ज्यादा समझ में आती है
और उपलब्ध होने पर क्या हम उसे पड़ना पसंद करेंगे ?
क्यो की हिन्दी में पड़ने समझने वाले का स्तर दोयम दर्जे का होता है ?
हम कब अपने को हेय समझने वाली मानसिकता से उबरेगे?
क्यो नही है अपनी भाषा को प्रथम दर्जा दिलवाने की जिद हमारे भीतर?
क्यो है हमारा आत्मसम्मान इतना दबा कुचला सा ?
कुछ ऐसे प्रश्न आप सबके सामने रखना जो मेरे मन में दहकते रहते है
क्यो एक प्रतिभा शाली को अपनी प्रतिभा को प्रर्दशित करने के लिए एक विदेशी भाषा का मोहताज होना पड़ता है ?
क्न्यो एक ऐसी भाषा में उसे स्तरीअ सामग्री उपलब्ध है , जो उसे कम समझ में आती है ?
और उस भाषा में उपलब्ध नही है जिसमे उसे ज्यादा समझ में आती है
और उपलब्ध होने पर क्या हम उसे पड़ना पसंद करेंगे ?
क्यो की हिन्दी में पड़ने समझने वाले का स्तर दोयम दर्जे का होता है ?
हम कब अपने को हेय समझने वाली मानसिकता से उबरेगे?
क्यो नही है अपनी भाषा को प्रथम दर्जा दिलवाने की जिद हमारे भीतर?
क्यो है हमारा आत्मसम्मान इतना दबा कुचला सा ?
कुछ ऐसे प्रश्न आप सबके सामने रखना जो मेरे मन में दहकते रहते है
Subscribe to:
Posts (Atom)