Monday, July 1, 2013

शोषक कौन?

लो फिर छिड गयी बहस ,
औरतों के शोषण की |
पर मौलिक बात को किया   ,
हर किसी ने नजर अंदाज़ |
ये मर्दों ने औरत का शोषण नहीं किया ,
शोषण किया है ताकतवर ने कमजोरों का |
कंही  भी  देख  लो ,पलट लो पन्ने इतिहास के |
शोषक  चाहे  जमींदार हो ,जागीरदार   हों ,सवर्ण हों,
अंग्रेज हों , मिल  मालिक हों ,नेता हों ,
सरकार हो, मर्द  हो   या हों इन्सान  |
शोषित चाहे  रियाया हो , दलित हों , गुलाम  भारतीय हों,
 मजदूर हों,मतदाता हों,  जनता हों , औरत हों या हो प्रकृति |
सत्ता, प्रभुता, श्रेष्ठता , हनक
बनाये रखने की जद्दो- जहद में
मानवता  शर्म सार है |
एक प्रश्न -
अगर  पृथ्वी (प्रकृति) शोषित है ,
तो शोषक कौन है ?
ये नेता ,ये सरकारें ,
या उपभोग की मानसिकता ,
तब न हम मर्द हैं न औरत हैं ,
न हिन्दू हैं न मुस्लिम हैं,
न मालिक हैं न मजदूर ,
हैं तो केवल उपभोक्ता
इस दुनिया में ,
शोषक भी हैं और शोषित भी | 
यक्ष प्रश्न फिर सर उठाता है ,
शोषित को गर हस्तानांतरित हो सत्ता ,
तो क्या वो शोषक न बन जायेगा ????


Saturday, February 7, 2009

हिन्दी मेरी पहचान नाम से ब्लॉग शुरु करने का उद्देश्य

हिन्दी मेरी पहचान नाम से ब्लॉग शुरु करने का उद्देश्य :
क्यो एक प्रतिभा शाली को अपनी प्रतिभा को प्रर्दशित करने के लिए एक विदेशी भाषा का मोहताज होना पड़ता है ?
क्न्यो एक ऐसी भाषा में उसे स्तरीअ सामग्री उपलब्ध है , जो उसे कम समझ में आती है ?
और उस भाषा में उपलब्ध नही है जिसमे उसे ज्यादा समझ में आती है
और उपलब्ध होने पर क्या हम उसे पड़ना पसंद करेंगे ?
क्यो की हिन्दी में पड़ने समझने वाले का स्तर दोयम दर्जे का होता है ?
हम कब अपने को हेय समझने वाली मानसिकता से उबरेगे?
क्यो नही है अपनी भाषा को प्रथम दर्जा दिलवाने की जिद हमारे भीतर?
क्यो है हमारा आत्मसम्मान इतना दबा कुचला सा ?
कुछ ऐसे प्रश्न आप सबके सामने रखना जो मेरे मन में दहकते रहते है